जाने अजमेर की कहानी: History Of Ajmer

अजमेर का इतिहास (History Of Ajmer): अजमेर राजस्थान राज्य का एक खुबसूरत शहर है जिसको स्मार्ट सिटी के नाम से भी जाना जाता है, आज की इस पोस्ट में हम अजमेर का इतिहास जानेंगे साथ ही अजमेर शहर की खुबसूरत जगहों को भी जानेंगे तो आईये आज की इस पोस्ट में हम अजमेर के इतिहास को करीब से जानने की कोशिश करते है,

आखिर अजमेर का नाम अजमेर कैसे पड़ा? अजमेर में कौन-कौन से किले तथा महल है? ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती तथा पुष्कर की कौन-कौन सी महत्वपूर्ण विशेषता है। इन सभी सवालों का जवाब हम आपको इस पोस्ट में आपको देंगे ।

अजमेर का इतिहास (History Of Ajmer)

अजमेर का इतिहास: अजमेर की स्थापना दूसरी शताब्दी में राजा वासुदेव ने की थी। इतिहासकारों के अनुसार कहा जाता है कि अजमेर की स्थापना राजा अजयपाल ने की थी। भूतकाल समय में पुरानाशहर वर्तमान शहर के दक्षिण-पश्चिम में था। यहां स्थित आज भी यहा स्थित खंडहरो द्वारा लगाया जा सकता है।। प्राचीन अजमेर को विभिन्न नामों से जाना जाता था जैसे जपमीर, अदमीर, जियांगीर और जलोपुर आदि।

अजमेर राजस्थान की उत्तर पश्चिमी अरावली पर्वत में बसा हुआ है। यह राजस्थान की राजधानी जयपुर से 135 किलोमीटर तथा भारत की राजधानी नई दिल्ली से 405 किलोमीटर दूर स्थित है।

शताब्दी ईसा के प्रसिद्ध बुद्ध राजा कनिष्क जिनकी मृत्यु 120 ई° को हुई इस क्षेत्र पर उनका राज था। राजा कनिष्क की मृत्यु के बाद उसके पुत्र हवेश्क ने 140 ई° तक बडी बडी आन बान से इस क्षेत्र पर शासन किया। हवेश्क केबाद राजावासुदेव गद्दी पर बैठा। एक मत के अनुसार कहा जाता है की वासुदेव ने ही अपने शासन के दौरान अजमेर के स्थापना की नींव रखी थी।

लेकिन वह अपने दादा की सामान एक मजबूत राजा साबित नहीं हुआ इसी वजह से जगह जगह उसकी विरोध में बगावत होने लगी।बागियो में अनहलपुर का राजा अजयपाल भी था। इसकी राजधानीतख्त पटन थी गुजरात खानदान के अधीन था और उन्हे टेक्स दिया करता था।

यह भी पढ़े-
उदयपुर को राजस्थान का जम्मू कश्मीर क्यों कहा जाता है ?

अजयपाल ने बागियो को एकत्र कर राजा वासुदेव की सेना को पराजित कर दिया और राजपूताना के कई इलाको पर अपना कब्जा कर लिया। इसमे अजमेर का इलाका भी शामिल था। अजयपाल ने अजमेर को अपनी राजधानी बनाकर एक अलग राज्य स्थापित कर लिया। यहा इस मत को बल मिलता है कि अजमेर की बुनियाद राजा वासुदेव ने पहले ही डाल दी थी।

जब अजयपाल ने वासुदेव को पराजित करके अजमेर को अपनी राजधानी घोषित किया तो अजयपाल ने अजमेर का विस्तार किया। यह अजमेर का इतिहास का सच है। अजयपाल अजमेर पर राजा के रूप में कई सालो तक राज करता रहा। 330ई° में गुप्तवंश के साहसी राजा चंद्रगुप्त ने सारे उत्तरी व राजपूताना क्षेत्र पर अपना कब्जा कर लिया।

इस प्रकार अजमेर पर पांचवी शताब्दी तक गुप्त वंश शासन रहा। गुप्तवंश के शासन काल मे मध्य एशिया के वहशी कबिलो ने भारत पर हमला किया और एक बडे क्षेत्र कै तबाह व बर्बाद कर डाला। गुप्तवंश का शासन भी इनकी दहशत व दरिदंगी के तूफान में बह गया। लगभग 150 साल तक राजपूताना क्षेत्र में अफरा तफरी का दौर रहा।

चौहान राजा ने आखिरकार अजमेर पर अपना शासन कर ही लिया। और उन्होंने एक मजबूत तथा स्थाई राज्य कीनी देकर यहां बड़े महत्वपूर्ण कार्य किए। नवी शताब्दी के अंतिम छोर में गज़नी के हाकिम अमीर नसीरूद्दीन सुबुकतगीन ने भारत पर हमला किया। काबुल और पंजाब के राजा जयपाल ने इसका डटकर मुकाबला किया।

979ई° में राजा अजयपाल और अमीर सुबुकतगीन की सेना एक महत्वपूर्ण युद्ध हुआ। जिसमें राजा जयपाल को हार का सामना करना पड़ा और राजा जयपाल ने टैक्स देने की बदले में सुबहुकुतुबुद्दीन से हाथ मिला लिया।

लाहौर पहुँच कर राजा जयपाल अपना वादा भूल गया, और आमीर सुबुकतगीन के खिलाफ फिर से युद्ध की तैयारी करने लगा। वतन, धर्म, जाति के नाम पर उसने अजमेर, कालिंजर, दिल्ली और कन्नौज के ताकतवर राजाओ से मदद मांगी। इन राजाओ ने तुरंत अपनी सेना राजा जयपाल की सहायता के लिए भेज दी। थोडे ही समय में जयपाल ने एक बडी सेना एकत्र कर ली।

आमीर सुबुकतुबुदीन को जब यह पता चला तो वह जयपाल की बडी सेना से घबराया नही, वह पूरे धेर्य के साथ जयपाल की सेना से भीड गया। उसकी बहादुर सेना ने जयपाल की विशाल सेना के छक्के छुडा दिए और काबुल व पेशावर के पूरे क्षेत्र पर अपना कब्जा कर लिया। राजा जयपाल युद्ध में पराजय का अपमान सह न सका और उसने आत्महत्या कर ली।

इसके बाद उसका पुत्र आनंदपाल गद्दी पर बैठा, ऊधर सुबुकतगीन की 996ई° में मृत्यु हो गई और उसकी जगह उसका पुत्र महमूद गज़नवी गद्दी पर बैठा। आनंदपाल ने अपने पिता का बदला लेने के लिए सुल्तान महमूद गजनवी से छेडछाड शुरू कर दी। पहले तो वह हार कर कश्मीर भाग गया। लेकिन फिर उसने अपने बाप की तरह 1006ई° एक बडी सेना एकत्र की जिसमे अजमेर, ग्वालियर , कन्नौज, उज्जैन आदि राजाओ की भी सेनाए शामिल थी।

इस विशाल सेना ने पेशावर के निकट सुल्तान महमूद गजनवी की सेना का मुकाबला किया। भीषण युद्ध के बाद महमूद गज़नवी की सेना ने आनंदपाल की सेना को हरा दिया और कांगडा तक चढाई कर दी। इसके बाद महमूद गजनवी ने भारत पर कई राज्यो में हमले किए और मथुरा, कन्नौज और सोमनाथ आदि से बहुत सारा खजाना लेकर गया ।

1024ई° में महमूद गजनवी ने पर हमला बोल दिया। अजमेर के राजा भीमदेव ने हारने के बाद भी इस्लाम धर्म को मान लिया और ताकत से भिन्न हो गया। सुल्तान मोहम्मद गजनबी ने अपने सेनापति साहू को अजमेर का उतराधिकारी बना दिया और वे खुद वापस गजनी देश लौट गया। जहां पर 1030 ईस्वी मैं उसकी मृत्यु हो गई।

अजमेर का इतिहास में 1044ई° को राजपूतो का सितारा फिर चमका। उन्होने अजमेर के मुस्लिम शासक को कत्ल करके सारंगदेव को अजमेर की गद्दी पर बैठा दिया। सारंगदेव की कुछ दिनो बाद मृत्यु हो गई। और अजमेर की हकूमत राजा अनादेव के हाथ में आ गई। उसने अजमेर में एक बडा तालाब बनवाया जो आज अनासागर के नाम से जाना जाता है।

अनादेव के बाद राजा पृथ्वीराज चौहान ने यहा शासन किया। पृथ्वीराज के शासन में अजमेर में बहुत विकास किया गया। और इसी दौर ख्वाजा गरीब नवाज मईनुद्दीन चिश्ती अजमेर में आए। राजा पृथ्वीराज ने यहा तारागढ का किला सुर्ख पत्थरो से बनवाया। यह किला इतना मजबूत और सुंदर था की दूसरे राजपूत राज्य इससे ईषर्या करते थे। राजा पृथ्वीराज चौहान का अजमेर का इतिहास में बहुत योगदान रहा है।

सन् 1191 ई° में सुलतान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने भारत पर हमला किया। पृथ्वीराज चौहान और दूसरे हिन्दू राजाओ ने गौरी का मुकाबला तराइन के मैदान में किया। इस युद्ध में मोहम्मद गोरी को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन मोहम्मद गोरी को इस हार का बहुत ही दुख हुआ था। इसलिए उसने 1193 फिर से भारत पर हमला बोल दिया। मोहम्मद गौरी की युद्ध करने पर पृथ्वीराज और अन्य हिन्दू राजाओ की संयुक्त सेना के साथ फिर से तराइन के मैदान में भीषण युद्ध हुआ।

इस भीषण युद्ध मे हिन्दू राजाओ की सेना को हार का सामना करना पडा। और पृथ्वीराज सहित कई हिन्दू राजा इस युद्ध में शहीद हो गए। इस युद्ध में विजयी होने के बाद मुहम्मद गौरी ने अजमेर और दिल्ली पर कब्जा कर लिया। और भारत में इस्लामी हकुमत की नींव रखी।

अजमेर का नाम अजमेर किसने रखा ?

अजमेर का नाम अजमेर के नाम पर पड़ा है। जिसकी स्थापना 1113 ईसवी में चौहान राजा अजय पाल ने की थी।अजमेर से 10 किलोमीटर दूरी पर स्थित अजय पाल मंदिर आज भी अजमेर के नामकरण की याद दिलाता है। अजमेर नगर गुगराघाटी को केंद्र मानकर बताया गया है।

अजमेर की प्रमुख संस्थापक अजय राज चौहान को माना जाता है, अजय राय ने 1113 ई.में अजमेर शहर की स्थापना की थी। अजय राज ने अपनी राजधानी का नाम अजमेरु रखा था।

अजमेर के मुख्य व दर्शनीय पर्यटन स्थल कौनसे है ?

  1. ब्रह्मा मंदिर-पुष्कर अजमेर में स्थित विश्व काााा प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर। यह चौधरी से शताब्दी में निर्मित विश्व में ब्रह्मा का एकमात्र मंदिर है जहां विधिवत पूजा अर्चना की जाती है, आप यहाँ पर घुमने जा सकते है|
  2. सावित्री मंदिर– पुष्कर के दक्षिण में रत्नागिरी पर्वत पर ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री जी का खुबसूरत मंदिर स्थित है|
  3. सोनी जी नसिया ( लाल मंदिर)– स्वर्गवास सेठ मूलचंद द्वारा निर्मित जैन मंदिर स्थित है, यह मंदिर भी काफी लोकप्रिय हैं|
  4. सलेमाबाद– यह निंबार्क संप्रदाय की प्रधान पीठ है, जो काफी प्रसिद्ध है
  5. अढाई दिन के झोपडा– बुलेट प्रथम चौहान सम्राट बीसलदेव द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला जिसे शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 से 1210 ईसवी के मध्य ढाई दिन के झोपड़े में परिवर्तित कर दिया|
  6. पृथ्वीराज स्मारक-तारागढ़ पहाड़ी पर चौहान सम्राट पृथ्वीराज धरती का स्मारक 13 जनवरी 1996 को राष्ट्र को समर्पित किया गया|
  7. आनासागर झील-पृथ्वीराज के दादा अनु राय द्वारा 1135 से 1150 के मध्य निर्मित झील यहां सम्राट जहांगीर द्वारा दौलत भाग गए शाहजहां द्वारा 1627 ईस्वी में संगमरमर बारादरी का निर्माण करवाया|
  8. पुष्कर-अजमेर शहर के उत्तर पश्चिम में 11 किलोमीटर दूरी पर स्थित हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल स्थित है|जिसमें 52 घाट है|घर में प्रसिद्ध झील पुष्कर झील स्थित है| पुष्कर का एक अन्य नाम कोकण तीर्थ भी इतिहास में था, पुष्कर को तीर्थराज भी कहा जाता है। संतोष बावला की छतरी पुष्कर अजमेर में है।
  9. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह (अजमेर):-हजरत शेख उस्मान हरौनी के शिष्य ख्वाजाा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह|दरगाह में हर वर्ष इदरीश संघ के राजा महा की 1 से 6 तारीख तक विशाल उर्फ पड़ता है जो सांप्रदायिक सद्भाव का अनूठा उदाहरण है|
  10. शाहजहानी मस्जिद -दरगाह की इस इमारत का निर्माण शाहजहां द्वारा 1638 ईस्वी में करवाया गया था|
  11. अकबर का किला -मुस्लिम दुर्ग निर्माण पद्धति से बनाया गया अजमेर का एकमात्र दुर्ग है|सम्राट जाकिर इसी दुर्ग की खिड़की में बैठकर जनता की फरियाद सुनते थे|सर टॉमस रो यहीं पर जागे से मिला था| 19 आठ से राजपूताना { अजय बाघर }राजकीय संग्रहालय इसी में है|
  12. तारागढ़ का किला:-मेवाड़ के राणा रायमल के युवराज पृथ्वीराज ने अपनी वीरांगना पति तारा के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रखा, प्रसिद्ध मुस्लिम संत मीरा साहब तारागढ़ के प्रथम गवर्नर मीर सैयद हुसैन की दरगाह स्थित है, दरगाह में घोड़े की मजार भी है इसे राजस्थान का जिब्राल्टर भी कहा जाता है.

आज की इस पोस्ट में आपने अजमेर का इतिहास और इसके मुख्य पर्यटन स्थल के बारें में जाना, ऐसी ही इतिहास और रोचकता से भरपूर पोस्ट को पढने के लिए Yestalkz.com को विजिट करें |

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अजमेर का इतिहास (History Of Ajmer): अजमेर राजस्थान राज्य का एक खुबसूरत शहर है जिसको स्मार्ट सिटी के नाम से भी जाना जाता है, आज की इस पोस्ट में हम अजमेर का इतिहास जानेंगे साथ ही अजमेर शहर की खुबसूरत जगहों को भी जानेंगे तो आईये आज की इस पोस्ट में हम अजमेर के इतिहास को करीब से जानने की कोशिश करते है,

आखिर अजमेर का नाम अजमेर कैसे पड़ा? अजमेर में कौन-कौन से किले तथा महल है? ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती तथा पुष्कर की कौन-कौन सी महत्वपूर्ण विशेषता है। इन सभी सवालों का जवाब हम आपको इस पोस्ट में आपको देंगे ।

अजमेर का इतिहास (History Of Ajmer)

अजमेर का इतिहास: अजमेर की स्थापना दूसरी शताब्दी में राजा वासुदेव ने की थी। इतिहासकारों के अनुसार कहा जाता है कि अजमेर की स्थापना राजा अजयपाल ने की थी। भूतकाल समय में पुरानाशहर वर्तमान शहर के दक्षिण-पश्चिम में था। यहां स्थित आज भी यहा स्थित खंडहरो द्वारा लगाया जा सकता है।। प्राचीन अजमेर को विभिन्न नामों से जाना जाता था जैसे जपमीर, अदमीर, जियांगीर और जलोपुर आदि।

अजमेर राजस्थान की उत्तर पश्चिमी अरावली पर्वत में बसा हुआ है। यह राजस्थान की राजधानी जयपुर से 135 किलोमीटर तथा भारत की राजधानी नई दिल्ली से 405 किलोमीटर दूर स्थित है।

शताब्दी ईसा के प्रसिद्ध बुद्ध राजा कनिष्क जिनकी मृत्यु 120 ई° को हुई इस क्षेत्र पर उनका राज था। राजा कनिष्क की मृत्यु के बाद उसके पुत्र हवेश्क ने 140 ई° तक बडी बडी आन बान से इस क्षेत्र पर शासन किया। हवेश्क केबाद राजावासुदेव गद्दी पर बैठा। एक मत के अनुसार कहा जाता है की वासुदेव ने ही अपने शासन के दौरान अजमेर के स्थापना की नींव रखी थी।

लेकिन वह अपने दादा की सामान एक मजबूत राजा साबित नहीं हुआ इसी वजह से जगह जगह उसकी विरोध में बगावत होने लगी।बागियो में अनहलपुर का राजा अजयपाल भी था। इसकी राजधानीतख्त पटन थी गुजरात खानदान के अधीन था और उन्हे टेक्स दिया करता था।

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अजयपाल ने बागियो को एकत्र कर राजा वासुदेव की सेना को पराजित कर दिया और राजपूताना के कई इलाको पर अपना कब्जा कर लिया। इसमे अजमेर का इलाका भी शामिल था। अजयपाल ने अजमेर को अपनी राजधानी बनाकर एक अलग राज्य स्थापित कर लिया। यहा इस मत को बल मिलता है कि अजमेर की बुनियाद राजा वासुदेव ने पहले ही डाल दी थी।

जब अजयपाल ने वासुदेव को पराजित करके अजमेर को अपनी राजधानी घोषित किया तो अजयपाल ने अजमेर का विस्तार किया। यह अजमेर का इतिहास का सच है। अजयपाल अजमेर पर राजा के रूप में कई सालो तक राज करता रहा। 330ई° में गुप्तवंश के साहसी राजा चंद्रगुप्त ने सारे उत्तरी व राजपूताना क्षेत्र पर अपना कब्जा कर लिया।

इस प्रकार अजमेर पर पांचवी शताब्दी तक गुप्त वंश शासन रहा। गुप्तवंश के शासन काल मे मध्य एशिया के वहशी कबिलो ने भारत पर हमला किया और एक बडे क्षेत्र कै तबाह व बर्बाद कर डाला। गुप्तवंश का शासन भी इनकी दहशत व दरिदंगी के तूफान में बह गया। लगभग 150 साल तक राजपूताना क्षेत्र में अफरा तफरी का दौर रहा।

चौहान राजा ने आखिरकार अजमेर पर अपना शासन कर ही लिया। और उन्होंने एक मजबूत तथा स्थाई राज्य कीनी देकर यहां बड़े महत्वपूर्ण कार्य किए। नवी शताब्दी के अंतिम छोर में गज़नी के हाकिम अमीर नसीरूद्दीन सुबुकतगीन ने भारत पर हमला किया। काबुल और पंजाब के राजा जयपाल ने इसका डटकर मुकाबला किया।

979ई° में राजा अजयपाल और अमीर सुबुकतगीन की सेना एक महत्वपूर्ण युद्ध हुआ। जिसमें राजा जयपाल को हार का सामना करना पड़ा और राजा जयपाल ने टैक्स देने की बदले में सुबहुकुतुबुद्दीन से हाथ मिला लिया।

लाहौर पहुँच कर राजा जयपाल अपना वादा भूल गया, और आमीर सुबुकतगीन के खिलाफ फिर से युद्ध की तैयारी करने लगा। वतन, धर्म, जाति के नाम पर उसने अजमेर, कालिंजर, दिल्ली और कन्नौज के ताकतवर राजाओ से मदद मांगी। इन राजाओ ने तुरंत अपनी सेना राजा जयपाल की सहायता के लिए भेज दी। थोडे ही समय में जयपाल ने एक बडी सेना एकत्र कर ली।

आमीर सुबुकतुबुदीन को जब यह पता चला तो वह जयपाल की बडी सेना से घबराया नही, वह पूरे धेर्य के साथ जयपाल की सेना से भीड गया। उसकी बहादुर सेना ने जयपाल की विशाल सेना के छक्के छुडा दिए और काबुल व पेशावर के पूरे क्षेत्र पर अपना कब्जा कर लिया। राजा जयपाल युद्ध में पराजय का अपमान सह न सका और उसने आत्महत्या कर ली।

इसके बाद उसका पुत्र आनंदपाल गद्दी पर बैठा, ऊधर सुबुकतगीन की 996ई° में मृत्यु हो गई और उसकी जगह उसका पुत्र महमूद गज़नवी गद्दी पर बैठा। आनंदपाल ने अपने पिता का बदला लेने के लिए सुल्तान महमूद गजनवी से छेडछाड शुरू कर दी। पहले तो वह हार कर कश्मीर भाग गया। लेकिन फिर उसने अपने बाप की तरह 1006ई° एक बडी सेना एकत्र की जिसमे अजमेर, ग्वालियर , कन्नौज, उज्जैन आदि राजाओ की भी सेनाए शामिल थी।

इस विशाल सेना ने पेशावर के निकट सुल्तान महमूद गजनवी की सेना का मुकाबला किया। भीषण युद्ध के बाद महमूद गज़नवी की सेना ने आनंदपाल की सेना को हरा दिया और कांगडा तक चढाई कर दी। इसके बाद महमूद गजनवी ने भारत पर कई राज्यो में हमले किए और मथुरा, कन्नौज और सोमनाथ आदि से बहुत सारा खजाना लेकर गया ।

1024ई° में महमूद गजनवी ने पर हमला बोल दिया। अजमेर के राजा भीमदेव ने हारने के बाद भी इस्लाम धर्म को मान लिया और ताकत से भिन्न हो गया। सुल्तान मोहम्मद गजनबी ने अपने सेनापति साहू को अजमेर का उतराधिकारी बना दिया और वे खुद वापस गजनी देश लौट गया। जहां पर 1030 ईस्वी मैं उसकी मृत्यु हो गई।

अजमेर का इतिहास में 1044ई° को राजपूतो का सितारा फिर चमका। उन्होने अजमेर के मुस्लिम शासक को कत्ल करके सारंगदेव को अजमेर की गद्दी पर बैठा दिया। सारंगदेव की कुछ दिनो बाद मृत्यु हो गई। और अजमेर की हकूमत राजा अनादेव के हाथ में आ गई। उसने अजमेर में एक बडा तालाब बनवाया जो आज अनासागर के नाम से जाना जाता है।

अनादेव के बाद राजा पृथ्वीराज चौहान ने यहा शासन किया। पृथ्वीराज के शासन में अजमेर में बहुत विकास किया गया। और इसी दौर ख्वाजा गरीब नवाज मईनुद्दीन चिश्ती अजमेर में आए। राजा पृथ्वीराज ने यहा तारागढ का किला सुर्ख पत्थरो से बनवाया। यह किला इतना मजबूत और सुंदर था की दूसरे राजपूत राज्य इससे ईषर्या करते थे। राजा पृथ्वीराज चौहान का अजमेर का इतिहास में बहुत योगदान रहा है।

सन् 1191 ई° में सुलतान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी ने भारत पर हमला किया। पृथ्वीराज चौहान और दूसरे हिन्दू राजाओ ने गौरी का मुकाबला तराइन के मैदान में किया। इस युद्ध में मोहम्मद गोरी को हार का सामना करना पड़ा। लेकिन मोहम्मद गोरी को इस हार का बहुत ही दुख हुआ था। इसलिए उसने 1193 फिर से भारत पर हमला बोल दिया। मोहम्मद गौरी की युद्ध करने पर पृथ्वीराज और अन्य हिन्दू राजाओ की संयुक्त सेना के साथ फिर से तराइन के मैदान में भीषण युद्ध हुआ।

इस भीषण युद्ध मे हिन्दू राजाओ की सेना को हार का सामना करना पडा। और पृथ्वीराज सहित कई हिन्दू राजा इस युद्ध में शहीद हो गए। इस युद्ध में विजयी होने के बाद मुहम्मद गौरी ने अजमेर और दिल्ली पर कब्जा कर लिया। और भारत में इस्लामी हकुमत की नींव रखी।

अजमेर का नाम अजमेर किसने रखा ?

अजमेर का नाम अजमेर के नाम पर पड़ा है। जिसकी स्थापना 1113 ईसवी में चौहान राजा अजय पाल ने की थी।अजमेर से 10 किलोमीटर दूरी पर स्थित अजय पाल मंदिर आज भी अजमेर के नामकरण की याद दिलाता है। अजमेर नगर गुगराघाटी को केंद्र मानकर बताया गया है।

अजमेर की प्रमुख संस्थापक अजय राज चौहान को माना जाता है, अजय राय ने 1113 ई.में अजमेर शहर की स्थापना की थी। अजय राज ने अपनी राजधानी का नाम अजमेरु रखा था।

अजमेर के मुख्य व दर्शनीय पर्यटन स्थल कौनसे है ?

  1. ब्रह्मा मंदिर-पुष्कर अजमेर में स्थित विश्व काााा प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर। यह चौधरी से शताब्दी में निर्मित विश्व में ब्रह्मा का एकमात्र मंदिर है जहां विधिवत पूजा अर्चना की जाती है, आप यहाँ पर घुमने जा सकते है|
  2. सावित्री मंदिर- पुष्कर के दक्षिण में रत्नागिरी पर्वत पर ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री जी का खुबसूरत मंदिर स्थित है|
  3. सोनी जी नसिया ( लाल मंदिर)- स्वर्गवास सेठ मूलचंद द्वारा निर्मित जैन मंदिर स्थित है, यह मंदिर भी काफी लोकप्रिय हैं|
  4. सलेमाबाद- यह निंबार्क संप्रदाय की प्रधान पीठ है, जो काफी प्रसिद्ध है
  5. अढाई दिन के झोपडा- बुलेट प्रथम चौहान सम्राट बीसलदेव द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला जिसे शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 से 1210 ईसवी के मध्य ढाई दिन के झोपड़े में परिवर्तित कर दिया|
  6. पृथ्वीराज स्मारक-तारागढ़ पहाड़ी पर चौहान सम्राट पृथ्वीराज धरती का स्मारक 13 जनवरी 1996 को राष्ट्र को समर्पित किया गया|
  7. आनासागर झील-पृथ्वीराज के दादा अनु राय द्वारा 1135 से 1150 के मध्य निर्मित झील यहां सम्राट जहांगीर द्वारा दौलत भाग गए शाहजहां द्वारा 1627 ईस्वी में संगमरमर बारादरी का निर्माण करवाया|
  8. पुष्कर-अजमेर शहर के उत्तर पश्चिम में 11 किलोमीटर दूरी पर स्थित हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल स्थित है|जिसमें 52 घाट है|घर में प्रसिद्ध झील पुष्कर झील स्थित है| पुष्कर का एक अन्य नाम कोकण तीर्थ भी इतिहास में था, पुष्कर को तीर्थराज भी कहा जाता है। संतोष बावला की छतरी पुष्कर अजमेर में है।
  9. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह (अजमेर):-हजरत शेख उस्मान हरौनी के शिष्य ख्वाजाा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह|दरगाह में हर वर्ष इदरीश संघ के राजा महा की 1 से 6 तारीख तक विशाल उर्फ पड़ता है जो सांप्रदायिक सद्भाव का अनूठा उदाहरण है|
  10. शाहजहानी मस्जिद -दरगाह की इस इमारत का निर्माण शाहजहां द्वारा 1638 ईस्वी में करवाया गया था|
  11. अकबर का किला -मुस्लिम दुर्ग निर्माण पद्धति से बनाया गया अजमेर का एकमात्र दुर्ग है|सम्राट जाकिर इसी दुर्ग की खिड़की में बैठकर जनता की फरियाद सुनते थे|सर टॉमस रो यहीं पर जागे से मिला था| 19 आठ से राजपूताना { अजय बाघर }राजकीय संग्रहालय इसी में है|
  12. तारागढ़ का किला:-मेवाड़ के राणा रायमल के युवराज पृथ्वीराज ने अपनी वीरांगना पति तारा के नाम पर इसका नाम तारागढ़ रखा, प्रसिद्ध मुस्लिम संत मीरा साहब तारागढ़ के प्रथम गवर्नर मीर सैयद हुसैन की दरगाह स्थित है, दरगाह में घोड़े की मजार भी है इसे राजस्थान का जिब्राल्टर भी कहा जाता है.

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